नई दिल्ली/रफ्तार डेस्क। बिहार की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है और इस बार चर्चा का केंद्र बना है बारबीघा विधानसभा क्षेत्र जहां एक ओर कांग्रेस अपने ‘स्वर्णिम अतीत’ को दोहराने की फिराक में है, तो वहीं दूसरी ओर एनडीए, खासकर बीजेपी, यहां नया इतिहास रचने के मूड में है। बारबीघा सीट कभी कांग्रेस का अभेद्य गढ़ मानी जाती थी। आंकड़े भी यही कहते हैं । अब तक हुए 17 चुनावों में 11 बार कांग्रेस ने जीत का परचम लहराया है। लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनावों में एनडीए का पलड़ा भारी रहा। 2020 में जेडीयू के सुदर्शन कुमार ने कांग्रेस के उम्मीदवार को सिर्फ 113 वोटों से हराया, जो बताता है कि मुकाबला कितना करीबी रहा।
बारबीघा ने कई बार कांग्रेस पर जताया भरोसा
बारबीघा विधानसभा सीट का गठन 1951 में हुआ था। तब से अब तक 17 बार यहां चुनाव हो चुके हैं, जिनमें से 11 बार कांग्रेस को जीत मिली है। यह बताता है कि यह क्षेत्र कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ रहा है। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में कांग्रेस की पकड़ यहां कमजोर हुई है। 2005 से पहले तक कांग्रेस मजबूत स्थिति में थी, लेकिन 2010, 2015 और 2020 में एनडीए गठबंधन के प्रत्याशी विजयी रहे। 2020 में जेडीयू के सुदर्शन कुमार ने कांग्रेस उम्मीदवार को मात्र 113 वोट से हराया, जो चुनावी इतिहास का एक बेहद करीबी मुकाबला था।
दो ठोस तथ्य
इतिहास गवाह है बारबीघा सीट से कांग्रेस 11 बार विजयी रही है, लेकिन 2010 के बाद से यह सीट उसके हाथ से फिसलती रही। 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार को बारबीघा से 29,000 से ज्यादा वोटों की बढ़त मिली, जो इस बात का संकेत है कि ग्राउंड पर समीकरण बदल चुके हैं।
2020 के बाद बदले सियासी समीकरण
पिछले विधानसभा चुनाव के बाद एनडीए का ग्राफ बारबीघा में चढ़ा है, खासकर बीजेपी का।2020 में जेडीयू भले ही सीट पर काबिज़ हुई, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बारबीघा से बीजेपी को 29,000 से अधिक वोटों की बढ़त मिली, जो सीधे तौर पर क्षेत्रीय रुझान को दर्शाता है।
NDA में सीट शेयरिंग पर फोकस
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार एनडीए में यह सीट जेडीयू के बजाय बीजेपी को मिल सकती है। इसका कारण 2024 में मिली वोटों की बढ़त और क्षेत्र में बीजेपी की ग्राउंड लेवल एक्टिविटी है।
2025 में लड़ाई होगी त्रिकोणीय?
इस बार मुकाबला सिर्फ एनडीए बनाम महागठबंधन तक सीमित नहीं है।प्रशांत किशोर (PK) की पार्टी जन सुराज धीरे-धीरे ग्राउंड पकड़ने लगी है। खासकर युवा और नए मतदाता वर्ग में उनकी पकड़ बढ़ रही है। अगर जन सुराज ने मजबूत उम्मीदवार उतारा तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है, जिससे एनडीए और महागठबंधन दोनों को नुकसान हो सकता है।




