नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । महाराष्ट्र के स्कूलों में हिंदी भाषा पढ़ाने को अनिवार्य बनाने के फैसले ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सरकार चौतरफा घिर गई है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) इस फैसले का विरोध करते हुए सरकार पर तीखा हमला बोल रही हैं। अब इस विवाद में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) भी कूद पड़ी है।
पार्टी सांसद सुप्रिया सुले ने इस कदम को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि भाषा और शिक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गंभीरता और विशेषज्ञों की सलाह से ही निर्णय लिया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि महाराष्ट्र सरकार इतनी जिद क्यों दिखा रही है, जबकि देश के बाकी राज्यों में ऐसी कोई नीति नहीं अपनाई जा रही।
एनसीपी (शरद पवार गुट) भी होगा विरोध मार्च का हिस्सा
एनसीपी (शरद पवार गुट) की वरिष्ठ नेता सुप्रिया सुले ने कहा है कि उनकी पार्टी बच्चों के भविष्य के साथ कोई समझौता नहीं कर सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि महज किसी को खुश करने के लिए शिक्षा प्रणाली से खिलवाड़ स्वीकार्य नहीं है। सुले ने ऐलान किया कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) पूरे जोश के साथ शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना द्वारा आयोजित विरोध मार्च में शामिल होगी। उन्होंने यह कहा कि शिक्षा का विषय पार्टी के लिए अत्यंत संवेदनशील और गंभीर है।
सरकार के फैसले पर विपक्ष लामबंद, निकलेगा बड़ा विरोध मार्च
महाराष्ट्र में स्कूलों में हिंदी को तीसरी अनिवार्य भाषा बनाए जाने के निर्णय के विरोध में राज्य का विपक्ष अब एकजुट हो गया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने 5 जुलाई को सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने का ऐलान किया है। यह विरोध मार्च सुबह 10 बजे गिरगांव से शुरू होकर आज़ाद मैदान तक पहुंचेगा। इस आंदोलन का नेतृत्व खुद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे कर सकते हैं।
उद्धव ठाकरे ने इस मुद्दे को केवल शिक्षा से जुड़ा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा मसला बताया है। उन्होंने साफ कहा, “हम महाराष्ट्र के मराठी और अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों में पहली से पाँचवीं तक हिंदी को जबरन थोपने नहीं देंगे। यह केवल पाठ्यक्रम का प्रश्न नहीं, बल्कि हमारे सांस्कृतिक स्वाभिमान पर हमला है।”
एनसीपी नेता शरद पवार ने भी इस फैसले पर आपत्ति जताई है। उन्होंने हाल ही में कहा, “प्राथमिक शिक्षा में हिंदी को अनिवार्य करना उचित नहीं है। पाँचवीं कक्षा के बाद भी बच्चे आसानी से हिंदी सीख सकते हैं। लेकिन हमें यह समझने की जरूरत है कि एक छोटे बच्चे के लिए एक साथ कई भाषाएं सीखना कितना व्यावहारिक है।”
क्या है महाराष्ट्र में हिंदी भाषा विवाद?
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश जारी किया, जिसके अनुसार राज्य के स्कूलों में पहली से पांचवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को मराठी और अंग्रेज़ी के अलावा तीसरी भाषा के रूप में हिंदी पढ़ाना अनिवार्य किया जाएगा। सरकार के इस फैसले ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी।
विवाद गहराने के बाद सरकार ने अपने आदेश में आंशिक बदलाव करते हुए कहा कि हिंदी अब अनिवार्य नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक भाषा होगी। यदि कोई छात्र तीसरी भाषा के तौर पर हिंदी की बजाय देश की किसी अन्य मान्यता प्राप्त भाषा को पढ़ना चाहता है, तो उसे इसकी अनुमति दी जाएगी, बशर्ते उस विकल्प को चुनने वाले छात्रों की संख्या कम से कम 20 हो। अगर किसी कक्षा में वैकल्पिक भाषा को पढ़ने वाले 20 छात्र नहीं हैं, तो ऐसे में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाएगा। सरकार की इस नीति को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है।




