नई दिल्ली रफ्तार डेस्क। 23 मार्च के दिन देश के उन योद्धाओं को याद किया जाता है जो ब्रिटिश हुकूमत के लिए खौफ का दूसरा नाम थे। भगत सिंह सुखदेव और राजगुरु। यह तीन ऐसे नाम थे जिनके अंदर क्रांति की ज्वाला धधक रही थी और किसी भी सूरत में ब्रिटिश हुकूमत के दांत खट्टे करके भारत को आजाद कराना चाहते थे। इसी कड़ी में उन्होंने 23 मार्च 1931 को अपना संघर्ष जारी रखते हुए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया और देश के लिए कभी ना भुला देने वाला योगदान दे गए।
क्यों दी गई फांसी?
भगत सिंह उस समय क्रांतिकारी का रूप ले चुके थे जब 17 दिसंबर 1928 कौन उन्होंने सांडर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी इसके बाद में ब्रिटिश हुकूमत किया निशाने पर आ गए थे। उन्होंने साइमन कमीशन का
भी जमकर विरोध किया था। बचपन से ही क्रांतिकारी रहे भगत सिंह ने देश के लिए हर वह कोशिश करनी जारी रखी जो भारत की आजादी में एक महत्वपूर्ण आयाम साबित हो सकता था। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम फेंक कर ब्रिटिश हुकूमत का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की थी। इसके बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। भगत सिंह पर धारा 302, धारा 129, धारा 4 और 6 एफ और IPC की धारा 120 के तहत दोष सिद्ध हुई। इसके बाद उन्हें 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई।
कैसा था फांसी वाले दिन का मंजर
जिस दिन भगत सिंह को फांसी दी जानी थी उस दिन वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। जब उनसे उनकी आखिरी इच्छा के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुझे किताब पूरी कर लेने दें उसके बाद फांसी दे देना। किताब पूरी पढ़ लेने के बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई और उस दिन से लेकर आज तक वह प्रेरणा स्रोत के रूप में हर भारतीय के दिलों में जिंदा है।





