नई दिल्ली / रफ्तार डेस्क । बिहार में 2025 का विधानसभा चुनाव धीरे-धीरे सियासी तापमान बढ़ा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) एकजुट होकर मैदान में उतरने की बात कर रहा है। सत्ता पक्ष की ओर से यह संदेश बार-बार दिया जा रहा है कि गठबंधन मजबूत है और पूरी तैयारी के साथ चुनाव लड़ा जाएगा। दूसरी ओर, विपक्षी खेमे में हलचल कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। हाल ही में पटना की यात्रा कर लौटे कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने जो संकेत दिए हैं, उनसे अटकलें तेज हो गई हैं कि कांग्रेस एक बार फिर 2010 जैसा मास्टरस्ट्रोक खेलने की योजना बना रही है। अगर ऐसा हुआ, तो विपक्ष में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को हर चाल सोच-समझकर चलनी होगी।
अब तक के राजनीतिक घटनाक्रम और तैयारियों पर नजर डालें तो साफ है कि 2000 और 2010 के बाद यह तीसरी बार होगा जब बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों पर राजनीतिक दल पूरी ताकत से उतर सकते हैं। ऐसे में यह चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि रणनीति, भरोसे और समीकरणों की असली परीक्षा साबित होने जा रहा है।
कांग्रेस का बिहार की सभी सीटों पर लड़ने का रहा है रिकॉर्ड
बिहार विधानसभा चुनावों में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति कांग्रेस के लिए नई नहीं है। आजादी के बाद से लेकर पिछली सदी तक, कांग्रेस वही पार्टी रही है जो राज्य की अधिकांश सीटों पर उम्मीदवार उतारती रही है। इस परंपरा को इस सदी में भी उसने दो बार दोहराया वर्ष 2000 और 2010 के चुनावों में।
वर्ष 2000 में जब झारखंड का बंटवारा नहीं हुआ था और बिहार में कुल 324 विधानसभा सीटें थीं, तब कांग्रेस ने सभी सीटों पर प्रत्याशी उतारे। लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे। कांग्रेस को सिर्फ 23 सीटों पर जीत मिली, जबकि 231 सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। उसी चुनाव में लालू प्रसाद यादव की पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल (राजद), जो जनता दल से अलग होकर बनी थी, ने 293 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और शानदार प्रदर्शन करते हुए 124 सीटों पर जीत दर्ज की।
झारखंड के अलग होने के बाद 2010 में एक बार फिर कांग्रेस ने बिहार की सभी 243 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। लेकिन परिणाम इस बार और भी शर्मनाक रहे। केवल 4 सीटों पर जीत मिली, जबकि 216 प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। जनता ने इस कदम को ‘हिम्मत’ नहीं, बल्कि ‘हिमाकत’ के रूप में देखा।
इस बार बयानबाजी नहीं, जमीन पर तैयारी करती दिख रही कांग्रेस
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर इस बार कांग्रेस सिर्फ बयानबाज़ी नहीं, बल्कि जमीन पर तैयारी करती दिख रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बातचीत में उलझी रह गई थी, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता लालू प्रसाद यादव ने बिना ठोस समन्वय के कई सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस को आखिरकार ‘समझौते’ की शर्तों पर संतोष करना पड़ा। इस बार कांग्रेस ने रणनीति में बदलाव करते हुए शुरुआत से ही सक्रियता दिखाई है। महागठबंधन के अन्य दलों से पहले ही उसने अपनी तैयारी शुरू कर दी। सबसे पहले बिहार कांग्रेस के प्रभारी को बदला गया, उसके बाद प्रदेश अध्यक्ष पद पर एक सशक्त संदेश देते हुए दलित विधायक राजेश राम को नियुक्त किया गया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी भी अब बिहार को लेकर ज्यादा गंभीर दिख रहे हैं। उनके लगातार बिहार दौरों के दौरान यह साफ हुआ कि वे सिर्फ गठबंधन पर निर्भर नहीं रहना चाहते। राजद का नाम लिए बगैर उन्होंने साफ तौर पर पिछड़ा, अति-पिछड़ा और वंचित वर्गों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति सामने रख दी है। इसी दिशा में कांग्रेस ने संगठनात्मक स्तर पर भी बड़े बदलाव किए हैं। प्रदेश स्तर पर कई जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में पिछड़ी जातियों को प्राथमिकता दी गई है, जिससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि कांग्रेस इस बार सामाजिक आधार पर मजबूत पकड़ बनाने की दिशा में काम कर रही है।
कांग्रेस की रणनीति पर सस्पेंस, दो नए दल मैदान में उतरने को तैयार
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर कांग्रेस की अंतिम रणनीति अभी स्पष्ट नहीं है। पार्टी सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी या राजद पर दबाव बनाकर गठबंधन के तहत अधिक सीटें हासिल करने की कोशिश करेगी, इस पर अभी औपचारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन जिस तरह से राजनीतिक परिस्थितियां बन रही हैं, उससे यह तय माना जा रहा है कि तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद यादव को कांग्रेस के साथ खुली बातचीत करनी ही पड़ेगी। हालांकि इसका अंजाम क्या होगा, यह वक्त ही बताएगा। इस अनिश्चितता के बीच दो नए राजनीतिक दलों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।
जन सुराज पार्टी के संस्थापक और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर पहले ही संकेत दे चुके हैं कि उनकी पार्टी पूरे राज्य में उम्मीदवार उतारेगी। पिछले उपचुनावों के समय से ही उन्होंने यह रुख स्पष्ट कर दिया था और समय-समय पर इसे दोहराया भी है। पार्टी पटना में आगामी दिनों में एक बड़ा शक्ति प्रदर्शन करने की तैयारी में है, जिससे उनके इरादों की गंभीरता झलकती है।
वहीं, हाल ही में आईपीएस सेवा से इस्तीफा देने वाले और ‘सिंघम’ की छवि बना चुके शिवदीप वामनराव लांडे ने राजनीति में चौंकाने वाली एंट्री की है। उन्होंने ‘हिंद सेना’ नामक एक नई पार्टी की घोषणा करते हुए सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का एलान कर दिया है। उनके इस कदम ने चुनावी समीकरणों में एक नया मोड़ ला दिया है। इन दोनों दलों की सक्रियता ने बिहार की राजनीति में नई ऊर्जा और अनिश्चितता दोनों भर दी है, जो पारंपरिक दलों के लिए एक चेतावनी भी है।





